त्रिफला स्वस्थ और लंबे जीवन जीने के लिए एक प्रसिद्ध पदार्थ है। यदि आप लगातार बारह वर्षों तक नियमित, नियमित, निश्चित मात्रा में इसका सेवन करते हैं, तो आपका शरीर हर तरह से रोग मुक्त हो जाता है। त्रिफला सभी रोगों की अमृत औषधि है।
इसमें ३ पदार्थ होते हैं
१. अमला, २. बेहड़ा और ३. पीला झुंड। इन तीनों पदार्थों के बारे में आप जानते हैं। इन्हीं के मिश्रण से त्रिफला बनाया जाता है। इन तीनों चीजों को लाकर हम घर पर त्रिफला बना सकते हैं।
इसकी क्रिया इस प्रकार है
त्रिफला बनाने के लिए एक भाग पीला कठोर चूर्ण, दो भाग बेहड़ा चूर्ण और तीन भाग आंवला चूर्ण मिलाएं। यह मिश्रण चार महीने से ज्यादा नहीं बनाना चाहिए। लंबे समय तक रहने से इसकी उपयोगिता कम हो जाती है।
त्रिफला का सेवन कैसे करना है यह भी जानना जरूरी है। इसे लगातार बारह वर्षों तक सुबह खाली पेट गर्म पानी के साथ लेना चाहिए। उसके बाद एक घंटे तक कुछ भी न खाएं। कितना सेवन करना है? इसलिए आप जितने बूढ़े हों उतने ग्राम लें। एक बात का ध्यान रखें, इसके सेवन से एक या दो पतले दस्त होते हैं, इसलिए घबराएं नहीं।
यदि त्रिफला को हर मौसम में निम्नलिखित चीजों के साथ लिया जाए तो इसकी उपयोगिता और बढ़ जाती है, क्योंकि हर मौसम की अपनी प्रकृति होती है। साल में दो-दो महीने के छह मौसम होते हैं। प्रत्येक मौसम में त्रिफला का सेवन करने की मात्रा निम्नलिखित है।
त्रिफला का सेवन कब और कैसे करे – When and how to consume Triphala
- श्रवण और भाद्रपद अर्थात अगस्त और सितंबर में त्रिफला के साथ संध्या नमक का सेवन करें। त्रिफला का 1/6 भाग नमक के साथ लें।
- अक्टूबर से नवंबर के बीच अश्विन और कार्तिक को चीनी के साथ लेना चाहिए। 1/6 भाग चीनी लें।
- मार्गशीर्ष और पौष अर्थात त्रिफला को अदरक के साथ दिसंबर और जनवरी में लें। अदरक 1/6 भाग होना चाहिए।
- माघ और फाल्गुन अर्थात लांडी पिंपली का चूर्ण त्रिफला के साथ फरवरी और मार्च में लें। यह 1/6 भाग से कम होना चाहिए।
- चैत्र और वैशाख अर्थात त्रिफला को शहद के साथ अप्रैल और मई में लें। शहद 1/6 भाग होना चाहिए।
- ज्येष्ठ और आषाढ़ अर्थात त्रिफला को 1/6 भाग गुड़ के साथ जून और जुलाई में लें।
जो कोई भी इस क्रम में त्रिफला का सेवन करेगा उसे निश्चित रूप से बहुत लाभ होगा। इसके नियमित सेवन से आप अपने शरीर में निम्नलिखित परिवर्तन देखेंगे।
त्रिफला प्रथम वर्ष में हमारे शरीर में आलस्य और आलस्य को दूर करता है। दूसरे वर्ष में जातक हर प्रकार से रोगमुक्त हो जाता है। तीसरे वर्ष में आंखों की रोशनी बढ़ने लगती है। चौथे वर्ष में शरीर की शोभा बढ़ने लगती है। शरीर दीप्तिमान और ऊर्जावान दिखता है। पंचम वर्ष में बुद्धि का विशेष विकास होता है। छठे वर्ष में शरीर बलवान था। सातवें साल तक बाल काले होने लगते हैं।
आठ साल की उम्र में शरीर की बुढ़ापा यौवन में बदलने लगती है। नवम वर्ष में व्यक्ति की आंखों की रोशनी विशेष रूप से समृद्ध हो जाती है। दस साल की उम्र में व्यक्ति का गला फूलने लगता है। ग्यारहवें और बारहवें वर्ष में व्यक्ति पढ़ने की उपलब्धि प्राप्त करता है।
